“उद्वेजयति तीक्ष्णेनप, मृदुना परिभूयते,

तस्ताद्यथार्हतो दण्ड: जयेतपक्ष मनाश्रितः।।“ – कौटिल्य

आचार्य कौटिल्य कहते हैं कि “कठोरतम दण्ड से प्रजा विचलित होती है। कोमल दण्ड से प्रजा तिरस्कार करने लगती है। अतः दण्ड की समुचित व्यवस्था होनी चाहिए।“

इससे पहले कि हम दण्ड के सिद्धान्तों की बात करें, ये जान लेना समीचीन होगा कि अपराध क्या है और दण्ड किसे कहते हैं? अपराध एक ऐसा कृत्य है जो समाज विरोधी है और जिसके लिए विधायिक ने दण्ड का प्रावधान किया गया है। दण्ड शब्द का अर्थ प्रमुख रूप से राजनीतिशास्त्र और प्रशासन के सम्बंध में किया जाता है। कामंदक नीतिसार, शुक्रनीति और महाभारत के शान्तिपर्व में दी गई परिभाषा के अनुसार अपराधों का दमन दण्ड कहलाता है और किसी को दण्डित करने के लिए जिस नीति को अपनाया जाताा है उसे ही दण्डनीति या दण्ड के सिद्धांत कहते हैं।

प्राचीन साहित्यों को पढ़ने पर यह पता चलता है कि दण्ड और इसके सिद्धान्तों की उत्पत्ति राज्य संस्था की उत्पत्ति के साथ हुई होगी। महाभारत के शांन्तिपर्व में कहा गया है कि मानवजाति की प्रारिम्भक स्थिति अत्यन्त पवित्र, दोषरहित कर्म, सत्प्रकृति आदि की थी जब न तो कोई राज्य था, न कोई राजा था, न दण्ड था और न दण्डी था। लोग धर्माचरण के द्वारा ही एक-दूसरे की रक्षा करते थे। श्लोक कुछ इस प्रकार है:-

“न राज्यो न च राजासीत, न दण्डो न च दाण्डिका।

स्वमेव प्रजाः सर्वा रक्षन्ति स्म परस्परम्य्।।“

कैली के अनुसार – अपराध उन अवैधानिक कार्यों को कहते हैं, जिनके बदले में दण्ड दिया जा सकता है और वे क्षम्य नहीं होते।

स्टीफेन के अनुसार – अपराध से अभिप्राय ऐसे अधिकारों के अतिक्रमण से है, जिनका परिमाण उस अतिक्रमण से संबंधित समाज में फैली हुई दुष्कृतियों से है।

आस्टिन के अनुसार – अपराध वे अवैधानिक कृत्य हैं, जिनके साबित हो जाने पर न्यायालय दण्ड देता है।

अपराधों के लिए दण्ड की व्यवस्था प्राचीन समय से चली आ रही है। मनुस्मृति में अपराध को महापातक, अनुपातक तथा उपपातक आदि तीन भागों में विभाजित कर कठोर दण्ड की व्यवस्था की है।

जहाँ तक दण्ड के सिद्धान्तों का प्रश्न है, यह सभ्य समाज की देन है। जैसे-जैसे मनुष्य सभ्यता की ओर अग्रसर हुआ है, दण्ड की व्यवस्था भी बदल गई है।

दण्ड के मुख्यतया चार प्रयोजन माने गए हैं, जिन्हें हम दण्ड के सिद्धान्त भी कह सकते हैं:-

(1) निवारणार्थ सिद्धान्त- अपराध के निवारण हेतु

(2) निषेधात्मक सिद्धान्त – अपराध के निषेध हेतु

(3) प्रतिकारात्मक सिद्धांत- बदला लेने हेतु

(4) सुधारात्मक सिद्धान्त- अपराधी में सुधार हेतु।

वर्तमान में सुधारात्मक सिद्धान्त का सबसे उपयुक्त सिद्धान्त माना जाता है। यह सिद्धान्त इस सोच पर आधारित है- “अपराध से घृणा करो, अपराधी से नहीं।“ सभ्यता के विकास के क्रम में भी यद्यपि सभी देशों में संभावित दोषियों के प्रति दोषों के गंभीर परिणाम और दंडयातनाओं का भय उपस्थित करने के लिय कठोर अवरोधक दंड दिए जाते रहे हैं, पर कभी-कभी सुधारात्मक प्रवृत्तियाँ भी उठती रही हैं।

प्राचीन रोम में दोषी को जेल में डाल देना मात्र ही सबसे बड़ा दंड माना गया और उसके बाद कोई यातना आवश्यक नहीं समझी गई । भारतवर्ष में कौटिल्य की रचनाओं में अपराधी को कारगर में प्रायश्चित्त कराने और अपने पापों का बोध कराने की व्यवस्था के द्वारा उन्हें विशुद्ध कराने का उल्लेख मिलता है।

अशोक ने भी अपने चतुर्थ स्तंभलेख में व्यवहारसमता और दंडसमता के साथ शुद्धचरित्र, वाले दोषियों के दंडों को कम करने का आदेश दिया है। ये बातें दंड विधान की सुधारात्मक प्रवृत्ति की ही द्योतक हैं।

स्मृतियों में धिग्दंड अथवा वाग्दंड की चर्चाएँ आती हैं, जो सर्वदा कायदंड और वधदंड से पहले आता था। उसका तात्पर्य यह था कि सामाजिक निंदा मात्र से यदि काम चल जाय तो कठोर यातनाओं की आवश्यकताएँ ही क्या ?

20वीं सदी में दंडविधान को सुधारात्मक स्वरूप देने के प्रयत्न लगातार किये जा रहे हैं । 1872 ई में लन्दन में एक अंतरराष्ट्रीय जेल सुधार और दंडविधान के किसी अंतरराष्ट्रीय स्वरूप को निश्चित करने के लिये सभा का आयोजन किया गया था।

धीरे धीरे कठोर दंडों के स्थान पर अपराधी के नैतिक जीवन के सुधार को ही लक्ष्य माना जाने लगा है । उसमें भय की अपेक्षा आशा अधिक रखी जाने लगी है। दंड के सुधारात्मक सिद्धांत में उसका विधान दोषी की अवस्था, सामाजिक वातावरण और स्थितिविशेष के आधार पर किया जाता है। दोषों के लिये समाज और वातावरण को भी उत्तरदायी माना जाता है। अत: दोषी को सुधारने के लिये मनोवैज्ञानिक उपायों का प्रयोग, उसका वैयक्तिक स्तर पर विचार, दोषी बालकों के लिय सुधारगृह की व्यवस्था, औद्योगिक शिक्षा, साधारण शिक्षा, नैतिक और धार्मिक व्याख्यान और अन्य सुनियोजित व्यवस्थाएँ की जाती हैं।

असंभव नहीं कि कुछ सदियों में व्यक्तिगत स्वतंत्रता को छीन लेना ही (जेल में रखना) सबसे बड़ा दंड माना जाए और मानव स्वभाव इतना उदात्त और पवित्र हो जाये कि मृत्यु दंड और आजीवन कारावास जैसे दंडों की आवश्यकता ही न रहे।

मनमोहन जोशी
आपके विचार कमेंट बॉक्स में ज़रूर लिखें

Shopping Cart
0