“पापी जनों को दण्ड देना चाहिये, समुचित सदा।

वर वीर क्षत्रीय-वंश का कर्त्तव्य है यह सर्वदा।”

– जयद्रथ वध

दण्ड और इसका दिया जाना प्राचीनकाल से ही अस्तित्व में रहा है। दण्ड दिये जाने के प्रमुख उद्देश्य निम्नलिखित हो सकते हैं –

(1) दण्ड द्वारा अपराधियों में भय उत्पन्न करना

(2) अपराधी के प्रति प्रतिशोध की भावना से बदला लेना

(3) अपराधों का निरोध

(4) अपराधी को पश्चाताप करने का अवसर प्रदान करना तथा

(5) अपराधी में सुधार करना।

इन उद्देश्यों को ध्यान में रखते हुए निम्न लिखित दण्ड सिद्धान्त बनाए गए हैं-

(1) प्रतिशोधात्मक सिद्धान्त

(2) प्रायश्चितात्मक सिद्धान्त

(3) निरोधात्मक सिद्धान्त

(4) सुधारात्मक सिद्धान्त।

(1) प्रतिशोधात्मक सिद्धान्त:- दण्ड का प्रतिशोधात्मक सिद्धान्त प्रतिशोध या बदले की भावना पर आधारित है। इस सिद्धान्त के अनुसार अपराधी को उसके अनुपात में ही दण्डित किया जाना चाहिए। कॉण्ट के अनुसार यह सिद्धान्त फ्जैसे को तैसाय् वाली लोकोक्ति पर आधारित है।

अधिकांश दण्डशास्त्री दण्ड के प्रतिशोधात्मक सिद्धान्त का समर्थन नहीं करते, क्योंकि उनके विचार से अपराधी को दण्डित इसलिए नहीं किया जाता कि वह अपनी करनी का फल भोगे, बल्कि इसलिए किया जाता है कि समाज से उसे दूर रखा जाना अपराधों के निवारण में सहायक होता है। यही कारण है कि वर्तमान दण्डशास्त्री इस सिद्धान्त में अधिक रुचि नहीं दिखाते हैं तथा प्रतिशोधात्मक सिद्धान्त का महत्व दिनों-दिन घटता जा रहा है।

(2)प्रायश्चितात्मक सिद्धान्त:- दण्ड के प्रायश्चितात्मक सिद्धान्त से आशय यह है कि अभियुक्त को दण्डित कर कारागार में इसलिये रखना आवश्यक है कि उसे अपने किये पर पश्चाताप करने का अवसर मिले। कारागार में जब दण्डित अपराधी एकान्त पाता है, तो उसके मन में सहज ही अपने कुकृत्य के प्रति पश्चाताप और आत्मग्लानि उत्पन्न होती है। प्रसिद्ध दार्शनिक विधिशास्त्री हीगेल ने भी दण्ड के प्रायश्चितात्मक सिद्धान्त का समर्थन किया है।

एकांत कारावास का उद्देश्य प्रायः यही है कि अभियुक्त को अपने अपराधकृत्य के लिए पश्चाताप करने का अवसर मिले और वह आत्मग्लानि के परिणामस्वरूप स्वयं को स्वस्थ नागरिक के रूप में पुनर्स्थापित कर सके।

(3) निरोधात्मक सिद्धान्त:- इस सिद्धान्त के अनुसार अपराधी को कारावासित करके पुनः अपराध के प्रति उसमें अरुचि उत्पन्न करना अपराध की रोकथाम का सर्वोत्तम उपाय माना गया है। इस प्रकार का दण्ड अपराधी की अपराध करने की इच्छा को समाप्त कर देता है, जिससे वह पुनः अपराध की ओर अग्रसर न हो। हत्या करने वाले अपराधी को मृत्युदण्ड दिया जाना निरोधात्मक दण्ड का उदाहरण है।

आलोचकों का मत है कि यह सिद्धान्त अधूरा है, क्योंकि इसके अन्तर्गत अपराधी को केवल समाज से पृथक् रखे जाने पर जोर दिया गया है, न कि इस दौरान उसके सुधार पर_ लेकिन अपराधी को सदैव के लिए तो कारागार में नही रखा जा सकता है, क्योंकि उसकी कालावधि समाप्त होते ही वह समाज में लौटेगा और संभवतः अधिक समाज विरोधी बन जाने के कारण पुनः अपराध करेगा। अतः अपराधी की मानसिकता में सुधार किया जाना परम आवश्यक है।

(4)सुधारात्मक सिद्धान्त:- अपराध एवं अपराधियों के प्रति वैज्ञानिक उपागमन ने यह पूर्णतः सिद्ध कर दिया कि यातनात्मक दण्ड प्रभावोत्पादक न होकर अपराधियों को अधिक खतरनाक तथा समाजद्रोही बना देता है। आपराधिक न्याय-प्रशासन में अमानुषिक एवं क्रूर दण्ड देकर उसके व्यक्तित्व को नष्ट नहीं किया जाना चाहिये। बल्कि उपचारात्मक दण्ड पद्धति द्वारा उसे समाज में पुनर्वासित करने का प्रयास किया जाना चाहिये।

सामण्ड ने सुधारात्मक दण्ड-पद्धति के विषय में तीन प्रमुख आपत्तियाँ प्रस्तुत की हैं। प्रथम यह कि इस पद्धति के अन्तर्गत अपराधियों को शारीरिक, बौद्धिक तथा नैतिक प्रशिक्षण की सुविधा उपलब्ध कराने के लिए कारागारों को सुखद आवास-गृहों में परिवर्तित करना होगा। ऐसे आरामदेह कारागारों में रहने वाले कैदियों के मन से दण्ड का भय पूर्णतः समाप्त हो जायेगा और वे स्वयं के सुधार की ओर बिल्कुल ध्यान नहीं देंगे। द्वितीय यह कि सुधारात्मक दण्ड का उन अपराधियों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा, जो स्वभावतः दुश्चरित्र, कुकर्मी या हिंसात्मक प्रवृत्ति के हैं।

वर्तमान में सुधारात्मक दण्ड प्रणाली ही सबसे ज्यादा प्रचलित और समाजशास्त्रियों तथा सामाजिक कार्यकर्त्ताओं के बीच मान्य है। इसका आधार है, अपराध से घृणा करना चाहिए, अपराधी से नहीं।।

– मनमोहन जोशी

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