“बंजर धरती की यही पुकार पेड़ लगाकर करो श्रृंगार।””बंजर धरती की यही पुकार पेड़ लगाकर करो श्रृंगार।”

– पर्यावरण संरक्षण से संबन्धित स्लोगन

भारत में पर्यावरण संरक्षण संबंधी अवधारणा एवं जन-जागरूकता प्राचीनकाल से ही रही है। हमारे सभी प्राचीन ग्रन्थों में पर्यावरण जागरूकता की बात भरी पड़ी है। लोक परंपराओं एवं लोकगीतों में भी पर्यावरण जागरूकता की बातें भरी पड़ी हैं। यदि हम अपनी सामाजिक प्रथाओं एवं रीति-रिवाजों का अवलोकन करें तो पता चलता है कि हमारे देश की महिलाएं भी प्राचीन काल से ही पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूक रहीं हैं। भारतीय संस्कृति में सभी प्राकृतिक तत्वों (पादप, जल स्रोत एवं जीव-जन्तु) को कोई-न-कोई देवता या वाहन संबंधित कर उनकी पूजा के माध्यम से उनके संरक्षण की बात जन-जन में समाहित की गई है। आज जो वृक्षों को काटने से बचाने हेतु चिपको आंदोलन प्रचलित है, यह प्राचीन काल से ही राजस्थान मे विश्नोई जाति की महिलाओं द्वारा अपनाया जा चुका है। इस तरह भारत में पर्यावरण संरक्षण संबंधी जागरूकता जन-जन के हृदय में बसी है और यही कारण है कि वर्तमान समय में भी भारत में पर्यावरण संरक्षण संबंधी जन-जागरूकता काफी सक्रिय है, जिसके लिए अनेक आंदोलन भी चलाए जा रहे हैं।

भारत में पर्यावरण संरक्षण संबंधी जन-जागरूकता का आंदोलन निम्नांकित रूप से किया जा सकता है-

चिपको आंदोलन:-यह आंदोलन 1973 में तत्कालीन उत्तर प्रदेश (वर्तमान में उत्तराखण्ड) सरकार द्वारा जंगलों को काटने का ठेका देने के विरोध मे एक गांधीवादी संस्था ‘दशौली ग्राम स्वराज मंडल’ ने चमोली जिले के गोपेश्वर में रेनी नामक ग्राम में प्रसिद्ध पर्यावरणविद्, सुन्दरलाल बहुगुणा के नेतृत्व में प्रारम्भ किया, जिसमें इस गाँव की महिलाओं ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस आंदोलन के तहत् महिलाएँ पेड़ों से चिपक कर पेड़ को काटने से रक्षा करती थी। यह आंदोलन भारत का सर्वाधिक लोकप्रिय एवं चर्चित पर्यावरण संबंधी आंदोलन रहा।

आप्पिको आंदोलन:-यह आंदोलन चिपको आंदोलन की तर्ज पर ही कर्नाटक के पाण्डुरंग हेगड़े के नेतृत्व में अगस्त 1993 में प्रारम्भ हुआ।

इसके अतिरिक्त:-

(1) पश्चिमी घाट बचाओ आंदोलन (महाराष्ट्र, गोवा, कर्नाटक, केरल),

(2) कर्नाटक आंदोलन (आदिवासियों के अधिकार के लिए),

(3) शान्त घाटी बचाओ आंदोलन (उष्ण कटिबंधीय सदाबहार वनों को बचाना),

(4) कैगा अभियान (नाभिकीय ऊर्जा संयंत्र के विरोध में),

(5) जल बचाओ, जीवन बचाओ (बंगाल से गुजरात तथा दक्षिण में कन्याकुमारी तक, मछली बचाओ),

(6) बेडथी आंदोलन (कर्नाटक की जल विद्युत योजना के विरोध में),

(7) टिहरी बाँध परियोजना (उत्तराखण्ड मे टिहरी बाँध के विरोध में),

(8) नर्मदा बचाओ आंदोलन,(9) दून घाटी का खनन विरोध,

(10) मिट्टी बचाओ अभियान,

(11) यूरिया संयंत्र का विरोध (मुम्बई से 25 किलोमीटर दूर वैशड़ में),

(12) इन्द्रावती नदी पर बाँध का विरोध (मुम्बई के इन्द्रावती नदी पर गोपाल पट्टनम एवं इचामपतल्ली बाँध का आदिवासियों द्वारा विरोध),

(13) गंध मर्दन बॉक्साइट विरोध संबंधित क्षेत्रें मे संरक्षण के लिए किया जा रहा हैपर्यावरण हमारे जीवन का एक महत्वपूर्ण अंग है।

पर्यावरण की रक्षा करने में लापरवाही बरतने का सीधा अर्थ है अपना विनाश करना।

हम अपने दैनिक जीवन में पर्यावरणीय संसाधनों का प्रयोग करते हैं। इनमें से कुछ नवीनीकरणीय हैं और कुछ नहीं। मानव जो कुछ भी करता है उसका सीधा प्रभाव पर्यावरण पर पड़ता है। पिछली दो सदियों में जनसंख्या में बेतहाशा वृद्धि हुई है तथा विकास एवं प्रौद्यौगिकी में तीव्र विकास से पर्यावरण पर पड़ने वाला दुष्प्रभाव कई गुना बढ़ गया है। हमें यह शीघ्र जान लेना चाहिए कि मानव जाति के कल्याण एवं अस्तित्व के लिए पर्यावरण का संरक्षण एवं संधारण अतिआवश्यक है। भूमि, वायु, पानी जैसे प्राकृतिक संसाधनों का प्रयोग बुद्धिमतापूर्ण ढंग से प्रयोग करना पर्यावरण संरक्षण के लिए एक आवश्यक कदम है जो केवल पर्यावरण के संबंध में जन-जागरूकता से ही सम्भव है।

• मनमोहन जोशी

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